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मधुकर उपाध्याय ने बहुत बढ़िया कहानी दी है फर्स्ट पोस्ट पर है-

मुलायम, अखिलेश और आप भी जरूर पढ़ें 1897 की ये कहानी

(ध्यान रहे: इस कहानी के सभी पात्र, स्थान और समय वास्तविक हैं और इन्हें लखनऊ में मुलायम सिंह यादव के परिवार में घट रही घटनाओं से जोड़ कर ही देखा जाना चाहिए.)

बात 1871 की है. अवध के इलाके में एक बहुत बड़े जमींदार होते थे, चौधरी गुरचरण लाल. उनके पास गोंडा के क्षेत्र में एक-डेढ़ लाख एकड़ जमीन की मिल्कियत भी थी. आजमगढ़, झूंसी, इलाहाबाद और मनकापुर में इनकी बड़ी हवेलियां थीं.

यह भी पढ़ें: अखिलेश आभासी दुनिया में जी रहे हैं और यही उन्हें ले डूबेगा

गुरचरण लाल केवल पैसे वाले ही नहीं थे. समाज में हर तरफ उनके मित्र थे. इन्हीं मित्रों में से एक थे स्वामी दयानंद सरस्वती जिन्होंने आर्य समाज की स्थापना की.

अवध ही नहीं पूरे हिंदुस्तान में थी धाक

साल 1857 के गदर में जब विद्रोहियों ने क्रांति के कोड के रूप में रोटियां और कमल का फूल बांटना शुरू किया, तो इनका घर उसका एक बड़ा केंद्र था.

इसके अलावा मिर्जापुर में गुरचरण लाल का लंबा चौड़ा खानदानी कारोबार भी था.

बनारस से सटे मिर्जापुर को ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक बड़ी मंडी के तौर पर बसाया था. वो कपास और रेशम के कारोबार का बड़ा केंद्र था. वहां नील के बड़े गोदाम भी थे. इन सभी धंधों में चौधरी की बड़ी हैसियत थी. तो जाहिर है कि चौधरी गुरचरण लाल का कारोबार और घर-बार हर तरफ से फल फूल रहा था.

गुरुचरण जी ने तीन विवाह किए और उनके सात बेटे थे. सबसे बड़े बेटे का नाम था बद्रीनारायण. बद्रीनारायण भी अपने पिता के जैसे ही काबिल थे.

कांग्रेस के गठन के साल भर बाद, 1886 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुए दूसरे महाधिवेशन में बद्रीनारायण मिर्जापुर की तरफ से शामिल हुए थे. इनकी भी पूछ-परख इतनी थी की 1911 में दिल्ली में जॉर्ज पंचम का दरबार हुआ तो सल्तनते बर्तानिया ने इन्हें भी बुलावा भेजा.

बाप बेटे में क्यूं ठनी

हुआ यूं कि एक दिन बाप-बेटे के बीच में महज 22 बीघे के जमीन के टुकड़े के लिए मनमुटाव हो गया. बेटा उसे किसी और तरह से इस्तेमाल करना चाहता था और बाप किसी और तरह से.

बढ़ते-बढ़ते बात इतनी बढ़ी की बाप-बेटे के बीच में अबोला हो गया. संबंध ना बचे. हर कोई हैरान. कुछ लोगों ने बीच-बचाव कराने की कोशिश भी की.

इन्हीं लोगों में एक थे स्वामी दयानंद सरस्वती. साल 1876 में स्वामी जी के दबाव में दोनों में राजीनामा भी हुआ. पर थोड़े दिन के बाद वही ढाक के तीन पात. बाप और बेटा फिर लड़ पड़े.

साल 1877 में गुरुचरण लाल जी ने उस 22 बीघे जमीन के टुकड़े के लिए अदालत में मुकदमा ठोंक दिया. मुकदमा चलता रहा और 20 साल में खिंचते-खिंचाते इलाहाबाद हाईकोर्ट जा पहुंचा. बाप बेटे में से किसी ने ना समय का मुंह देखा ना पैसे का.

गुरचरण लाल ने उस समय के इलाहाबाद के दो सबसे बड़े फिरंगी वकील, लेन हार्वुड और एलिस्टन को रख लिया.

बेटे की तरफ से उस समय के सबसे बड़े और महंगे हिन्दुस्तानी वकील मोतीलाल नेहरू और तेज बहादुर सप्रू मुकर्रर हुए. खैर 57 पेशियों के बाद 1897 में हाईकोर्ट ने बेटे के पक्ष में फैसला दिया.

जब बेटा जीता तो पिता ने जिसने बरसों तक उससे बात भी नहीं की थी. उसने एक बड़ी दावत दी. दावत में बेटे को भी बुलाया.

लोग हैरान कि ये बेटे से हारने पर क्यों दावत दे रहे हैं. कोई बोला इसलिए कि बेटे ने साबित कर दिया कि वो बड़ा हो गया है. कोई बोला कि बेटे को बेइज्जत करने के लिए कि उसने बाप को अदालत में हराया. गुरचरण लाल से किसी ने पूछा तो वो उसको बोले ‘तुम नहीं समझोगे’.

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खैर दावत हुई. बेटा आया और उस जमाने के रईसों की तरह ऊंचा रौबदार साफा पहन कर आया. लोग सांसे रोके देख रहे थे कि अब क्या होता है.

बेटा दनदनाता हुआ बाप के सामने पहुंचा और सबके सामने पांवों पर अपना साफा रख कर बोला ‘अब जो है सब आपका है जो चाहे करिए’.

इस तरह बेटे ने बाप को एक बार फिर सबके सामने हराया.

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सेब के कस्बे सोपोर में ६ जनवरी, १९९३

६ जनवरी आज जैसी ही थी। सुबह सब अपने-अपने काम में लगे थे। तब सोपोर कश्मीर का प्रमुख व्यवसायिक कस्बा था, लिहाजा ट्रकों का आना-जाना लगा रहता था। उस दिन भी कुछ ट्रक खाली हो रहे थे और कुछ जा रहे थे। उन दिनों सोपोर में बीएसएफ भी कड़ी गश्त रहती थी।
कस्बे के मुख्य चौक पर शालपोरा गली में कुछ लोग एक ट्रक को खाली कर रहे थे। पास की दुकानों पर रोज की तरह माहौल था। तभी फायर की आवाज आयी और फिर बीएसएफ वालों की राइफलें गरज उठीं। पूरा कस्बा तहस-नहस हो गया। उस समय की रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेकेएलएफ के आतंकियों ने बीएसएफ के एक गश्ती दल पर हमला कर एक जवान को मार दिया और उसकी राइफल भी छीन ले गये। इससे बीएसएफ के लोग बुरी तरह आक्रोशित हो गये।
२००१ में सोपोर में वहां के एक निवासी (नाम अब मुझे याद नहीं) ने बताया था कि तब वह बाल कटवाने वहां एक नाई की दुकान में था। फायरिंग की आवाज सुनकर जब बाहर निकला तो देखा कि अधाधुंध फायरिंग हो रही थी। बांडीपोरा को जाने वाली बस को रोककर बीएसएफ के जवान उसमें बैठे यात्रियों पर फायर कर रहे थे।
यही नहीं, समद टाकीज, लड़कियों के एक कालेज और कई दुकानों को जला दिया गया जिसमें कई लोग जलकर मर गये। कुल मिलाकर करीब ६० लोग मारे गये और साढ़े तीन सौ दुकाने जला दी गईं थीं।
कुछ दिन बाद सरकार ने राहत व मुआवजे की घोषणा की लेकिन सैयद अली शाह गिलानी ने लोगों से कहा कि हम सरकारी मदद नहीं लेगें। हम पूरे कश्मीर के लोगों से मदद मांगेगे। गिलानी के इस रवैये के चलते सोपोर में सरकारी राहत नहीं बंट पायी और बाद में गिलानी ने भी कुछ नहीं किया।
उस समय इस नरसंहार की जांच का काम सीबीआई को सौंपा गया। सीबीआई ने जांच भी शुरू की लेकिन चश्मदीद लोगों ने सहयोग नहीं किया लिहाजा धीरे-धीरे जांच ठंडे बस्ते में चली गई।
चित्र परिचय - ६ जनवरी १९९३ को सोपोर में हुए नरसंहार का दृश्य। फोटो साभार कश्मीर लाइफ

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नेता जी और बेटा जी
कहानी दो नेतापुत्रों की और उप्र में संभावित गठबंधन की

नेता जी और बेटा जी, यह शीर्षक पढ़ा टाइम्स आफ इंडिया में सागरिका घोष के आलेख पर। नेता जी मतलब अखिलेश और बेटा जी मतलब राहुल बाबा। बेटा जी भागे-भागे फिर रहे हैं तो नेता जी अपने बप्पा नेता जी से राजनीतिक नेतृत्व छीनकर ले रहे हैं। बेटा जी १०-१२ साल में भी मम्मी जी के आंचल की छाया से बाहर नहीं निकल पा रहे तो नेता जी ने ८ साल में ही बप्पा नेता जी से बड़ी छवि खड़ी कर ली। बेटा जी के आसपास चाटुकारों की फौज है जो उनके हर हां में हां मिलाती है तो नेता जी चाचाजी, मामाजी और बप्पा जी से दो-दो हाथ कर रहे हैं। बेटा जी अपनी क्षमता की वजह से एक भी अपना समर्थक न खड़े कर पाये और नेता जी की एक हांक पर लाखों लोग लखनऊ पहुंच गये। बेटा जी अपनी कर्मस्थली उप्र को मानते हैं लेकिन वह शायद ही बता पाएं कि इस सूबे में कितनी कमिश्नरी और कितने जिले हैं जबकि नेता जी हर जिले में सौ-दो सौ को तो नाम से ही जानते होंगे। आंकड़ेबाजी की तो पूछिये मत।
नेता जी अखिलेश ने अपनी राजनीतिक सक्रियता के पहले चार साल में सपा को पूर्ण बहुमत दिलाया तो बेटा जी पार्टी को सत्ता गंवाने की ओर ले गये। नेता जी अपने मुद्दों पर डटे रहते हैं और खुद मोर्चा संभालते हैं तो बेटा जी मम्मी जी को बता कर छुट्टी मनाने भाग लेते हैं। कितनी बार ऐसा हुआ जब लोगों को उम्मीद थी कि बेटा जी कुछ करतब दिखाएंगे लेकिन बेटा जी चुपचाप खिसक लिए विदेश में छुट्टी मनाने।
जब बेटा जी राजनीति में सक्रिय हुए थे, तब कई बेटा जी साथ थे जिन्हें उनकी यूथ ब्रिगेड कहा जाता था। सिंधिया जी, पायलट जी, जतिन जी। लेकिन अब ये तीनों तो कहीं दिखाई नहीं दे रहे। नेता जी को देखिये, एकला चले थे और पूरी यूथ ब्रिगेड तैयार कर दी।
हाल में संसद में बेटा जी ने हल्ला मचाया कि वे बोलेंगे तो भूचाल आ जाएगा लेकिन जब बोले तो पत्ता भी न हिला। उनकी पार्टी के लोग न बोले और न उनके आरोप के समर्थन में कहीं मोदी जी पर हल्ला बोला। यही नहीं, बेटा जी अपनी पार्टी के अच्छी छवि वाले नंदन नीलकेनी जैसे जानकार लोगों को भी खोते जा रहे हैं।
अब ऐसे में यदि कांग्रेस और अखिलेश के बीच चुनावी गठबंधन होता है तो बाकी पार्टियों के लिए मुश्किल हो सकती है। लेकिन कांग्रेस वैसे ही अखिलेश की बी टीम बन जाएगी जैसे एक समय बिहार में लालू जी की थी और इस समय नीतीश जी की बी टीम है। (फोटो साभार क्विंट वेबसाइट से)

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यूपी-बिहार में क्या वाकई राजनीति जाति से ही तय होती है ?
यह कहा जाता है कि बिहार और यूपी में जाति की गणित के आगे सब अच्छे काम फेल हो जाते हैं। बिहार विधानसभा में भाजपा की हार को इसी तरह व्याख्यायित करते हैं वोकल संसाधनों से संपन्न वर्ग के बहुत से लोग। जब आप उनसे कहेंगे कि उत्तर प्रदेश चुनाव में साफ हो जाएगा कि नोटबंदी का असर जनता में क्या है, तो वे झट बोल देंगे कि अरे वहां तो जातिवाद चलता है। मान लिया उनकी बात। लेकिन जब इस व्याख्या को बिहार और यूपी में इससे पहले के चुनावों पर लागू करके देखें तो यह व्याख्या कहीं ठहरती ही नहीं। २०१० के बिहार विस चुनाव में जदयू-भाजपा एक साथ थे और राजद-पासवान एक साथ। यानी यादव, मुसलमान व दलित तो भाई ये लोग क्यों नहीं जीते? यूपी में अब तक के किसी विस चुनाव परिणाम पर यह व्याख्या फिट नहीं बैठती। २००७ में सपा हार गई लेकिन उनकी जातियां तो वहीं थीं, भाजपा चौपट रही जबकि जातिवादी गणित में तो सब अगड़े भाजपा के साथ ही होने चाहिए थे। बसपा जीती जो ब्राह्मण विरोधी पार्टी थी लेकिन फिर भी ब्राह्मणों ने उसे वोट किया। २०१२ में यह जातीय समीकरण फिर गड़बड़ा गया और भाजपा के माने जाने वाले ब्राह्मण सब में बंट गये। भाजपा बेचारी ४८ पर रह गयी। अब देखिये २०१४ का आम चुनाव। भाजपा नीति एनडीए ने ८० में से ७३ सीटें जीतीं जबकि जातियां तो वही थी। २००९ में कांग्रेस ने २२ सीटें जीती थी और भाजपा ने ११। जातीय समीकरण तब भी वही रहे होंगे। बिहार में भी देख लें आम चुनाव और विधानसभा चुनाव। जनता सिर्फ वो नहीं है जो वोकल हैं और ढोल बजाते फिर रहे हैं। जनता तो बेचारी अपनी रोजी-रोटी में ही इतना टूट जाती है कि इन चकल्लसों के लिए न वक्त बचता और न ताकत।

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प्रधानमंत्री के नाम

प्रधानमंत्री जी,
पूरे देश को आपसे बहुत उम्मीदें हैं। आपने मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, स्वच्छ भारत जैसे जबरदस्त नारे दिये। पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक कर पाक प्रयोजित आतंकवाद की कमर तोड़ दी, ऐसा आपके मंत्री लोग कहते हैं। इसके बैनर-होर्डिंग भी लग गई थीं। फिर आपने काले धन को नेस्तनाबूद करने, आतंकवाद की कमर तोड़ने और भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए यकायक ८ नवंबर की रात आठ बजे ५०० व १००० के नोट बंद करने का एलान कर दिया। देश लाइनों में लग गया लेकिन आपकी तारीफ करता रहा। देश के लिए वे करोड़ों लोग लाइन में लगे जिनकी मासिक आय ६-७००० रुपये भी नहीं है। कष्ट सहे, बीमारियां सहीं लेकिन आपने सपनों का भारत बनाने के लिए साथ मांगा था तो ये सब आप पर आंख बंद करके भरोसा किये हुए साथ खड़े हुए। आपने लाइन में खड़े लोगों को काला धन वाला भी कह दिया, तब भी लोगों ने बुरा नहीं माना। मानना भी नहीं चाहिए क्योंकि देश बनाने का काम बहुत बड़ा है और इसमें छोटी-मोटी ग़ड़बड़ियों को नजरअंदाज करना ही चाहिए। आप कैशलेस ले आ आये। लोग उसके भी फायदे गिनाने लगे आपके साथ डटे रहकर। आपने कहा, ५० दिन में सपनों का भारत न दे पाऊं तो फांसी दे देना। सब जानते हैं कि यह जुमला ही है क्योंकि आप लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए जुमलों का इस्तेमाल करते ही रहे हैं। १५ लाख वाला तो सबको याद ही है। वह तो शुक्रिया अमित भाई का कि उन्होंने साफ किया कि यह चुनावी जुमला था और था भी। आपने कालाधन के खिलाफ अभियान के प्रचार के लिए अजय देवगन को चुना लेकिन किसी ने सवाल न उठाया जबकि अजय देवगन का नाम पनामा लीक्स में आया था। खैर पनामा लीक्स में आये नामों को शायद आपने गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि लिया होता तो डीमोनेटाइजेशन से पहले इसमें आये नामों पर जांच व कार्रवाई होती।
खैर, ३१ दिसंबर की रात जब आपने देश से बात की तो लोगों को बड़ी उम्मीद थी कि वे जो कष्ट सह रहे हैं, उनके एवज में शायद आप बताएंगे कि कालाधन कितना नष्ट हुआ, आतंकवाद पर क्या असर पड़ा और भ्रष्टाचार की क्या स्थिति है। लेकिन आपने तो कुछ बताया ही नहीं और सीधे बजट पर पहुंच गये।
देश आप पर भरोसा कर रहा है, इसलिए पूछ नहीं रहा लेकिन आजाद भारत के इतिहास के पहले जिम्मेदार-ईमानदार-देश के लिए सबकुछ न्योछावर करने वाले प्रधानमंत्री की जवाबदेही बनती है कि वह देश को बताए कि किन-किन सपनों की दिशा में हम कितना आगे बढ़ गये और नहीं बढ़ पाये तो आगे अब इस दिशा में क्या और करने की जरूरत है? आतंकवाद कितना कम हो गया? भ्रष्टाचार कितना कम हुआ?
देश के बहुत से लोग आपकी बातों पर यकीन कर रहे हैं कि ७० साल तक सरकारें इस देश को भ्रष्ट बनाती रहीं, उन्होंने देश बनाया नहीं बल्कि देश का कबाड़ा ही किया है। आपके भाषणों, जुमलों व मन की बातों से ये लोग मानने लगे हैं कि आप से योग्य, ईमानदार, विजनरी और देशभक्त प्रधानमंत्री कभी नहीं हुआ। आप से भी इन करोड़ों लोगों की उम्मीदें टूटीं तो फिर देश का बहुत नुकसान हो जाएगा।
इसलिए प्रधानमंत्री जी, लोगों के भरोसे व देश का मान रखिये और बताइये देश को -
१. ५० दिन में कितना कालाधन नष्ट हुआ?
२. देश में आतंकवाद ८ नवंबर से पहले की तुलना में कितना कम हुआ?
३. भ्रष्टाचार पर कितना अंकुश लगा?
देश के मन की बात भी करिये कभी….

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दोपदी सिंघार की कविताएं

....और जसिन्ता केरकेट्टा ने लिखा - एक दिन जंगल की हर लड़की लिखेगी कविता....

तीन दिन पहले फेसबुक पर पहली बार पढ़ी दोपदी की कविता। दोपदी के प्रोफाइल को देखा तो वहां सिर्फ दोपदी ने लिख रखा है - कवि हूं, आदिवासी हूं, संघर्षों भरी अपनी कथा है। मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले की रहने वाली हैं और वहां के गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ी हैं। छत्तीसगढ़ के जगदलपुर स्थिति बस्तर विवि में भी अध्ययन किया है और प्राइवेट स्कूल टीचर के तौर पर कार्यरत हैं। बस इतनी ही जानकारी है और एक फोटो लगी है। फोटो टिन की छत के नीचे की है, पीछे अलगनी पर कपड़े टंगे हैं और सीलिंग फैन पूरी रफ्तार से चल रहा है। कवर पर एक पेंटिंग लगी है जिसमें जंगल है, फूल हैं, बेलबूटे हैं और एक चिड़िया है। बस इतनी जानकारी मिलती है दोपदी के बारे में उनके फेसबुक प्रोफाइल से।
शुभम श्री की कविता पर चल रही बहस के बीच तीन दिन पहले यकायक उनकी कविता दिखाई दी फेसबुक पर। किसी ने शेयर की थी। पूरी कविता पढ़ गया। फिर गया दोपदी की वाल पर। फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी, कुछ ही देर में स्वीकृत हो गई।
दोपदी की कविताएं पूरी व्यवस्था को नंगा करके बींध रही हैं। वे चीख-चीख कर हर उस बात तो फरेब और मक्कारी साबित कर रही हैं जिनपर हमारा समाज लट्टू है और जिसका जश्न हम इस सोमवार मनाने जा रहे हैं।
-राजेंद्र तिवारी

पेटीकोट
नहीं उतारा मैंने अपना पेटीकोट
दरोगा ने बैठाये रखा
चार दिन चार रात
मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट
मेरी तीन साल की बच्ची अब तक मेरा दूध पीती थी
भूखी रही घर पर
मगर मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट
मेरी चौसठ साल की माँ ने दिया उस रात
अपना सूखा स्तन मेरी बिटिया के मुंह में
मगर मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट.
नक्सल कहकर बैठाया रखा चार दिन चार रात
बोला, 'बीड़ी लेकर आ'
बीड़ी का पूड़ा लेके आई
'चिकन लेके आ रंडी'
चिकन ले के आई
'दारू ला'
दारू लेके आई.
माफ़ करना मेरी क्रांतिकारी दोस्तों
मैं सब लाई जो जो दरोगा ने मंगाया
मेरी बिटिया भूखी थी घर पर
दरोगा ने माँगा फिर मेरा पेटीकोट
मैं उसके मुंह पर थूक आई
भागी, पीछे से मारी उसने गोली मेरी पिंडली पर
मगर मैंने उतारा नहीं अपना पेटीकोट।

पेटीकोट - 2
आपने बताया है
आदिवासी औरत पेटीकोट नहीं पहनती
आदिवासी औरत पोल्का नहीं पहनती
एक चीर से ढँक लेती है शरीर
आप सर आप मेडम
आप सदियों से नहीं आए हमारे देस
आपने कहा बैठा नहीं सकता कोई दरोगा
किसीको चार दिन चार रात थाने पर
आप सर आजादी से पहले आए होगे
हमारे गाँव
वो आजादी जो आपके देश को मिली थी 1947 में
आप नहीं आए हमारे जंगल
आपको नहीं पता पखाने न हो
तो हम औरतें नहीं छोड़ती अपने खसम
कि दो रोटी लाता है रात को एक टेम लाता है
पर लाता है लात मारता है पर रोटी लाता है
रोटी है तो दूध है
दूध है तो मेरा बच्चा
आप नहीं आए हमारे गाँव
नहीं तो पूछते क्यों औलाद से माया रखती है दोपदी
क्या करेगा तेरा बच्चा
भूखा दिन काटेगा जंगल जंगल भटकेगा और मरेगा
आप नहीं आए हमारे गाँव
नहीं तो बताती
ये जंगल बचाएगा ये जानवर बचाएगा
ये गोली खाएगा ये किसी आदिवासन को
लेकर भाग जाएगा
यहीं हमारी रीत है
आप नहीं आए हमारे गाँव
नहीं तो बताती कि जो लोग आते है आपकी तरफ से
उनकी निगाह बड़ी लम्बी है
आप एक चीर से शरीर ढाँकने की बात करते हो
हम पेटीकोट पोल्के में नंगे दिखते है
आप जरूर ही नहीं आए हमारे गाँव।

मन की बात
प्रधानजी जब तब रेडियो पर बताते हो मन की बात
कि मन लगाके पढ़ो आगे बढ़ो काला धन मत रखो
आप किससे बात करते हो प्रधान जी
सेठलोग रेडियो कहाँ सुनते
वो तो देखते है सेठानियों का नाच उनके घर टीवी है
और हमारे बच्चे नहीं करते परीक्षा का टेंसन
उन्हें पैदा होते ही पता होता है
कि उन्हें तो फेल होना है
हमारे यहाँ कोई आत्महत्या नहीं करता प्रधानजी
यहाँ हत्याएँ ही होती है
बता आते है आपको मामाजी कि सुसेड हो गई
प्रधानजी आपने बताया था कि सबको काले धन का
पंद्रह हजार रुपया दोगे
सेठों की पेटी गाँव देहात के हवाले करोगे
आप पुल बनवा दो आप उससे अस्पताल खुलता दो
आप स्कूल चला दो
बातों से बात नहीं बनती आप हमें बस पढ़ने लिखने लायक
हो जाए ऐसा मास्टर भिजवा दो
रूपिया तो हम जुटा लेंगे
धरती देगी जंगल देगा महुआ नीम करोन्दा देंगे
मामाजी से कहना
हमारी लाड़लियों को साइकल नहीं चाहिए
पैर चाहिए खड़े होने को
और अटल बिहारी सड़क जाती है
मसान, कच्चा मसान था गाँव में तो लोग
बरसात में सड़क को करते है मसान
बाकी साल उसपर भूत नाचते है
प्रधान जी हमारी मन की बात भी कभी सुनना
अकेले में जो चिंता करते हो इतनी देश की
उसमें गुनना।

सलवार की गांठ
अम्मा ने समझाया बार-बार
जिनगी में बहुत जरूरी हो गयी गांठ
खींच कर लगाई गांठ पर गांठ
बांध-रखना अच्छे से
खुल न जाये यहाँ- वहां
खेलते- कूदते हुए
उठते बैठते हुए , आते समय , जाते समय
देख लेना, समझ लेना, जान लेना, बूझ लेना
टोय टोय लेना गांठ, कस कस लेना गांठ
सखी दोपदी !
कैसे बताऊँ अम्मा को!
कैसे समझाऊं अम्मा को!
खेत में, खलिहान में, रास्ते में, स्कूल में
परिवार में, पड़ोस में
गांव में देश में
कितनी तेज़ तेज़ धार वाली आँख
बाँधू संभालू लाख
कहाँ- कहाँ ! कैसे-कैसे!!
खुल-खुल जाती गांठ
खोल खोल दी जाती गांठ
अम्मा लगाती जाती गांठ पर गांठ
खुल खुल जाती गांठ खोल दी जाती गांठ।

आग
कविता अब नारा बना ली जाएगी
कविता अब झगड़ा बना ली जाएगी
कविता को नाव बना लूँगी
और पार करूँगी पदुमा
जिसके ऊपर पुल नहीं बनाया
कविता को इस्कूल बना लूँगी
और तैयार करूँगी ऐसे बच्चे
जो सवाल उठाएँगे
जो मना करेंगे
जो फ़रार होंगे
जो प्रेम करेंगे
कविता को बिस्तर बना लूँगी
और सोऊँगी दिनभर की मजूरी-मारपीट के बाद
कविता को दूध बनाऊँगी
बेटा तुझे पिलाऊँगी
कविता को रोटी बनाऊँगी
गाँव भर दुनिया भर को जिमाऊँगी
पापा सुन लो
कविता को खसम करूँगी मैं
और कविता को रख दूँगी
जहाँ अपनी बिटिया की लाश रखी थी
दिया नहीं कविता जलाऊँगी मैं
जिसने सोलह साल में देख ली
नौ मौत छह डिलेबरियाँ
उसके लिए
अँधेरा कविता है
मार कविता है झगड़ा कविता है
घाव कविता है घर कविता है
तुम लोगों को बहुत परनाम
कविता बनाना बतलाया
इस कविता से मिज़स्ट्रेट के दफ़्तर
आग लगाऊँगी मैं ।

मैं कौन हूँ
बकरी पटवारी के पास नहीं गई
बकरी होने का सर्टिफ़िकेट लेने
गाय नहीं गई पटवारी के पास
गाय हूँ ऐसा सर्टिफ़िकेट लेने
भैंस नहीं गई
हिरनी नहीं गई
ऊँठनी नहीं गई
मोरनी नहीं गई
कुतिया नहीं गई
मगर हम जंगल की नार
कहा एक नारी ने
'कुतिया जा जाके
अपने आदिवासी होने का
सर्टिफ़िकेट ला
जा जाके औरत होने का सर्टिफ़िकेट ला'
बताओ ज्ञानी ध्यानी सभी पिरानी
कोई औरत होने का सर्टिफ़िकेट कैसे दे
जो पेटीकोट
दरोग़ा ने नहीं उतारा
वो कविता करने वाले
वो कविता पढ़ने वाले
वो कोमल मन के
जीवों ने कहा उतारो
और बताओ दुनिया को
कि तुम औरत हो
कि आदिवासी हो
कि कविता लिखती हो
कि तुम्हारे संग रेप हुआ है
कि तुम्हारी औलाद मरी है
कि तुम मजूर हो
कविलोग और पढ़नेवालों
सुन लो देके कान
मैं कुतिया हूँ
मैं कुतिया हूँ
मैं क्रीम नहीं लगाती
मैं काली कुतिया हूँ।

और एक कविता जसिनता केरकेट्टा की...
साहेब! कैसे करोगे खारिज ?
......................................
साहेब !
ओढ़े गये छद्म विषयों की
तुम कर सकते हो अलंकारिक व्याख्या
पर क्या होगा एक दिन जब
शहर आई जंगल की लड़की
लिख देगी अपनी कविता में सारा सच,
वह सच
जिसे अपनी किताबों के आवरण के नीचे
तुमने छिपाकर रखा है
तुम्हारी घिनौनी भाषा
मंच से तुम्हारे उतरने के बाद
इशारों में जो बोली जाती है
तुम्हारी वे सच्चाईयां
तुम्हें लगता है जो समय के साथ
बदल जाएगी किसी भ्रम में,
साहेब !
एक दिन
जंगल की कोई लड़की
कर देगी तुम्हारी व्याख्याओं को
अपने सच से नंगा,
लिख देगी अपनी कविता में
कैसे तुम्हारे जंगल के रखवालों ने
'तलाशी' के नाम पर
खींचे उसके कपड़े,
कैसे दरवाजे तोड़कर
घुस आती है
तुम्हारी फौज उनके घरों में,
कैसे बच्चे थामने लगते हैं
गुल्ली–डंडे की जगह बंदूकें
और कैसे भर आता है
उसके कलेजे में बारूद,
साहेब !
एक दिन
जंगल की हर लड़की
लिखेगी कविता
क्या कहकर खारिज करोगे उन्हें?
क्या कहोगे साहेब?
यही न....
कि यह कविता नहीं
"समाचार" है.....!!
जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 10.8.2016

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घड़ियाली आंसुओं के बीच

अगर हमला करना है तो मुझपर करो। किसी को गोली चलानी है तो मुझ पर चलाए लेकिन दलित भाइयों पर हमला बर्दाश्त नहीं होगा।

जातीय विभाजन की राजनीति छोड़नी होगी। समाज को बंटने से बचाने के लिए हमें बहुत सावधानी बरतनी होगी।

मुट्ठीभर लोग गौरक्षा के नाम पर समाज में टकराव पैदा करना चाहते हैं। इन्हें दंडित करना बहुत जरूरी है। राज्य सरकारें उन पर कार्रवाई करें।

ये तीन बातें नयी राजनीति की शुरुआत कर रहे किसी व्यक्ति ने नहीं कहीं, किसी वाम नेता ने नहीं कहीं, किसी संत या सामाजिक नेता ने नहीं कहीं।

ये बातें कहीं हैं इस देश के प्रधानमंत्री ने जो संसद में पूर्ण बहुमत की सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं।
ये बातें कहीं है देश के प्रधानमंत्री ने जिनकी पार्टी की मजबूत सरकार तमाम उन राज्यों में है जहां इस तरह की घटनाएं कर रही हैं।
ये बातें कही हैं देश के प्रधानमंत्री ने जो पिछले २५ सालों के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री माने जाते हैं।

क्या प्रधानमंत्री को नहीं पता कि दलित उत्पीड़न, मुसलमानों को अलग-थलग कर समाज को बांटने और जाति की राजनीति करने वाले कौन हैं?

जरूर पता है, लेकिन असली सवाल यह है कि वे तब क्या कर रहे थे जब ये घटनाएं हो रही थीं, वे तब क्या कर रहे थे जब उनके ही गृह राज्य गुजरात में दलित अपने उत्पीड़न के खिलाफ सड़क पर गुहार लगा रहे थे?

ये बातें उन्होंने तब क्यों नहीं कहीं जब हैदराबाद में रोहित वेमुला फांसी पर लटकने पर मजबूर हुआ?
वे तब क्या कर रहे थे जब दादरी में अखलाक को तथाकथित गौरक्षकों ने सरे आम मौत के घाट उतार दिया था?
वे तब क्या कर रहे थे जब उनकी सरकार के संस्कृति मंत्री दादरी कांड को लेकर बेहुदा बातें कर रहे थे?
ये बातें उन्होंने तब क्यों नहीं कहीं, जब दादरी कांड में अखलाक के फ्रिज में पाये गये मांस के टुकड़े को लेकर हिंदू राष्ट्र की स्थापना करने में उनके लोग लगे थे?

वे तब क्या कर रहे थे जब बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी गौरक्षा के नाम पर भोंडे विज्ञापन छाप कर समाज को बांटने की कोशिश कर रही थी। इन विज्ञापनों को चुनाव आयोग ने छापने योग्य नहीं पाया और इन पर रोक लगाई।

वे तब क्या कर रहे थे जब उनकी पार्टी के अध्यक्ष और उनके खास अमित भाई शाह बिहार चुनाव में वैमनस्य फैलाने के लिए जहर उगल रहे थे?

मोदी जी की बातों पर भरोसा कैसे हो
मोदी जी ने बिहार चुनाव के समय आरक्षण के सवाल पर कहा था कि बाकी राजनीतिक मतभेद अपनी जगह, लेकिन आरक्षण पर मेरी वही सोच है जो लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की है। मैं अपने रहते इसमें कोई बदलाव नहीं होने दूंगा।
२६ अक्टूबर २०१५ को बिहार शरीफ की चुनावी रैली में मोदी जी ने कहा था कि मौजूदा आरक्षण नीति में न तो कोई बदलाव किया जाएगा और न ही इसे डायल्यूट किया जाएगा।
लेकिन क्या ऐसा हुआ? चुपचाप छोटे-छोटे स्तर पर इसे डायल्यूट करने की खबरें लगातार आती रहती हैं। क्या मोदी जी ने किसी को डपटा कि ऐसा क्यों किया जा रहा है?

जब अपनी उन बातों पर ही मोदी जी कायम न रह सके तो हैदराबाद में कही गयी बातों पर कायम रहेंगे और अपने संघ परिवार, अपनी पार्टी, अपने सांसदों-विधायकों और अपनी सरकार को वह सब करने पर मजबूर करेंगे जिसकी घोषणा वह पिछले दो दिनों से चिल्ला-चिल्लाकर कर रहे हैं।

घड़ियाली आंसू वाली कहावत तो सब जानते ही हैं!

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उप्र की सियासत - ५

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

टाउन हाल स्टाइल वाला आपका संबोधन सुना। अच्छा लगा कि आपने गौरक्षा के नाम पर फैलाए जा रहे आतंक पर अपना रुख स्पष्ट किया आपने कहा - “गौरक्षा के नाम पर लोग दुकानें खोल कर बैठ गये हैं, मुझे बहुत गुस्सा आता है। कुछ लोग जो पूरी रात असामाजिक काम करते हैं, लेकिन दिन में गौरक्षक का चोला पहन लेते हैं। ये फर्जी गौरक्षक हैं जिन्होंने गौरक्षा के नाम पर दुकानें खोल ली है ..इनका dossier निकालने की ज़रूरत है ... सचमुच में वे गौसेवक हैं तो मैं आग्रह करता हूँ कि सबसे ज्यादा गायें कत्ल से नहीं, प्लास्टिक खाने से मरती हैं - जो समाज-सेवा करना चाहते हैं वे गाय का प्लास्टिक खाना बंद करवा दें तो बहुत बड़ी सेवा होगी। स्वयंसेवा औरों को दबाने के लिए नहीं होती है।”

विलंबित दर्द व गुस्सा क्यों
सवाल यह उठता है कि आपकी सरकार कुछ कर क्यों नहीं पाती? अखलाक की हत्या से शुरू हुई कहानी लगातार जारी है। जम्मू व हिमाचल होते हुए मोदीजी के गृह राज्य गुजरात तक में। आप प्रधानमंत्री हैं और आपकी पार्टी का पूरा बहुमत है। गुजरात में भी आपकी पार्टी की ही सरकार है, फिर क्यों इन फर्जी गौरक्षकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती? बेकसूर दलित मारे जाते रहे लेकिन आपकी की जुबान घटनाओं के समय न पब्लिक में खुली और न सरकार में। आपकी पार्टी के नेता व मंत्री समाज में वैमनस्य बढ़ाने वाले बयान खुले आम देते रहते हैं लेकिन आप उन पर कोई अंकुश लगाते नहीं दिखाई देते। अखलाक के मामले में भी जब पूरा देश आपकी ओर देख रहा था, आपने चुप्पी साध रखी थी। आपके मंत्री व नेता वहां जाकर माहौल बिगाड़ रहे थे, लेकिन आपकी पार्टी की ओर से उनको कुछ नहीं कहा गया। इस बार की तरह ही, उस बार भी आपने बहुत बाद में एक बांग्ला अखबार को दिये गये इंटरव्य़ू में अफसोस जाहिर किया। विलंबित प्रतिक्रियाओं के पीछे आपकी कोई पालिटिक्स है या फिर आप संघ के घेरे में इतना बांध दिये गये हैं कि मन की बात समय पर नहीं कह पाते। और आप जब मन की बात कहते हैं, तब तक इतना विलंब हो चुका होता है कि उसका कोई असर नहीं होता।

बिहार चुनाव में भागवत का बयान
मुझे बिहार विधानसभा चुनाव याद आता है। चुनाव के बीच संघ प्रमुख ने आरक्षण वाला बयान जारी कर दिया था और उसकी सफाई देते-देते आप थककर यह कहने पर भी मजबूर हो गये थे कि आरक्षण के मसले पर आप नीतीश और लालू जैसी ही सोच रखते हैं। हालांकि संघ प्रमुख के बयान का स्थानीय संघ इकाई ने स्पष्टीकरण नुमा खंडन भी मीडिया में दिया लेकिन नतीजा आपने देख ही लिया। न गऊ काम आई, न जंगलराज और न नीतीश कुमार का डीएनए। इस समय उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल बन रहा है। आपके एक पार्टी नेता वेश्या का जुमला उछाला और उसके बाद गुजरात के गौरक्षक सक्रिय हो गये। उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय की राजनीतिक महत्ता तो आप जानते ही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कुछ मजबूत ताकतें आपको उतना मजबूत न देखना चाहती हों जितना आप बिहार जीत कर हो जाते और अब उत्तर प्रदेश जीतकर हो सकेंगे। इन ताकतों को शायद लगता हो कि यदि अमित भाई के नेतृत्व में भाजपा इन राज्यों में अच्छा कर गई तो आपकी जोड़ी सबको ठेंगे पर रखने लगेगी? आपको याद तो होगा ही कि बिहार में कैसे मजबूत स्थिति से शुरू करके पार्टी खिसकती गई और नतीजों में हरैला डुर्र साबित हुई। उप्र में भी इस समय तमाम लोग आपकी ही पार्टी को मजबूत मानते हैं?

उप्र चुनाव वजह है क्या?
यह भी हो सकता है कि आपका यह दर्द, व्यथा उप्र के चुनाव की वजह से हो। सब समझते हैं कि उत्तर प्रदेश में एकीकृत दलित सबसे बड़ा वोट बैंक है, मुसलमानों से भी बड़ा। लेकिन इसका एक हिस्सा आपके दल के साथ भी रहता है। हो सकता है कि विलंबित व्यथा और गुस्सा व्यक्त करने के पीछे यह बड़ी वजह रही हो।लेकिन क्या आप समझते हैं कि लोग वही समझेंगे जो आप उनको समझाना चाहते हैं? पब्लिक अब सब जानती है। भले गुजरात की घटनाएं टीवी न्यूज में न दिखाई गयी हों लेकिन उसके फोटो व सूचनाएं फेसबुक और व्हाट्सएप्प के जरिये गांव-गांव तक पहुंच गई होंगी। डिजिटल इंडिया तो आपका ही नारा है और २०१४ का आपका कैंपेन भी आमजन की डिजिटल सक्रियता के लिए उत्प्रेरक रहा है।

आपकी बातों से भ्रांतियां पनप रही हैं। ये भ्रांतियां सबके लिए खतरनाक हैं और हां, आप और आपकी पार्टी के लिए भी। आपमें और सपा के बीच बिहार चुनाव से शुरू हुई ‘समझदारी’ (वैसे यह ‘समझदारी’ कल्याण सिंह और मुलायम सिंह के बीच नब्बे के दशक में शुरू हुई थी जो बिहार में पब्लिक के बीच आ गई) की कुश्ती भी खतरनाक है।

अंत में
एक बात तय है कि अब तक जो बातें आपने अपने मन की बात और इस टाउनहाल संबोधन में कहीं हैं, उन पर अमल करने को पूरी सरकारी मशीनरी और पार्टी को लगा दीजिए, फिर देखिये आपका देश कैसे आपको २०१४ से भी ज्यादा बड़ी ऊंचाई पर बैठा देगा। मेरी बात यकीन न हो तो कर के देख लीजिए।

जय हिंद


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उप्र की सियासत-४

अखिलेश की साइकिल की छूंछी खोलने में लगे हैं रामू चाचा, शिवपाल पहलवान और आजम मियां

समाजवादी पार्टी को मोटे तौर पर नंबर एक पार्टी माना जा रहा है। वोटों समीकरण (यादव + कुछ अन्य ओबीसी + मुसलमान) देखें तो है भी। लेकिन इस वोट समीकरण में एक लोचा आ गया है।

अखलाक कांड और बिहार चुनाव से पैदा हुआ लोचा
मंदिर आंदोलन के समय से मुलायम को मौलाना मुलायम कहा जाने लगा था। सांप्रदायिकता विरोध पर देश में दो बड़े चेहरे उभर कर आये थे। एक लालू का जिन्होंने आडवाणी को रथयात्रा के दौरान गिरफ्तार किया और दूसरे मुलायम, जिन्होंने चुनौती दी थी कि उनके सीएम रहते अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराने की बात तो दूर, परिंदा भी पर न मार सकेगा। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले जनतादल से निकली पार्टियों को मिलाकर एक मंच या एक पार्टी बनाने का अभियान चला। नीतीश कुमार ने चौटाला व देवगौड़ा को जुटाया। मुलायम को नेता घोषित किया। फिर खबर आयी कि विलय बिहार चुनाव के बाद होगा। अभी जदयू व राजद अपने-अपने चिन्ह पर ही चुनाव लड़ेगी। चुनाव के लिए महागठबंधन बना जिसमें जदयू, राजद, सपा व कांग्रेस शामिल हुईं। कौन कितनी सीट पर लड़ेगा, इसका भी हिसाब बना दिया गया। किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। पटना में बड़ी सभा हुई जिसमें सपा की ओर से शिवपाल यादव ने शिरकत भी की। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आये, सपा कम सीटों का बहाना बनाकर अपने को गठबंधन से अलग कर लिया और पप्पू यादव व तारिक अनवर को लेकर एक और मोर्चा बना लिया। साथ ही, हर सीट पर चुनाव लड़ने का एलान भी। बिहार के इस हाई वोल्टेज चुनाव में मुलायम का इस तरह से महागठबंधन से किनारा कर लेना और फिर हर सीट पर लड़ने का फैसला करना, भाजपा को मदद पहुंचाने जैसा ही माना गया। यही नहीं, मुलायम ने बिहार चुनाव में भाजपा की लहर होने की बात सार्वजनिक मंचों से कही।
बिहार चुनाव के समय ही उत्तर प्रदेश के दादरी में अखलाक कांड हुआ लेकिन इस कांड में स्थानीय प्रशासन व पुलिस की भूमिका यानी राज्य की सपा सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में रही। इससे पहले मुजफ्फरनगर के दंगों का मामला तो था ही। बिहार चुनाव में तो उनका स्टैंड व उनके भाषण मुसलिमों के बीच आशंका के बीज बो गये। बिहार में हर समझदार आदमी यह कह रहा था कि ओवैसी व मुलायम मोदीजी के इशारे पर चल रहे हैं। इसलिए यह कह पाना बहुत मुश्किल है कि उप्र का मुसलमान २०१२ की तरह इस बार भी मुलायम के पीछे खड़ा होगा। लेकिन कोई और है भी नहीं।

नीतीश का कोण
उत्तर प्रदेश में नीतीश कुमार का जदयू भी चुनाव लड़ने के लिए कमर कस रहा है। कल नीतीश की मुलायम के गृह जिले इटावा में सभा है। नीतीश की रणनीति छोटे-छोटे दलों को साथ लेकर अनुकूल जातीय समीकरण वाले क्षेत्रों पर फोकस करने की है। नीतीश कुमार कुरमी जाति से आते हैं और उप्र में कुरमियों का कोई बड़ा नेता नहीं है। कुरमी अब तक सपा और भाजपा में बंटता रहा है। यहां ध्यान देने की बात यह है कि दो दर्जन से ज्यादा सीटों पर कुरमी काफी हद तक निर्णायक स्थिति में है और नीतीश भी कुरमी बहुल इलाकों में ही सभा करने पर जोर दे रहे हैं। शराबबंदी उनका इश्यू है। अगर नीतीश का असर पड़ा तो सपा को नुकसान होगा ही।

अखिलेश की छवि ठीक है लेकिन…
हालांकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की छवि आम लोगों के बीच ठीक है। उनके समय में कई काम भी हुए और चल भी रहे हैं। शुरुआती दिनों में तो ला एंड आर्डर की स्थिति भी नियंत्रण में थी। लेकिन पिछले दो साल से गुंडई बढ़ने और यादववाद के हावी होने का जबरदस्त माहौल बना है। इसकी काट अखिलेश टीवी और अखबारों में विज्ञापन देकर बनाना चाहते हैं लेकिन अब लोग समझदार ज्यादा हैं और वे विज्ञापन का मतलब समझते हैं। अखिलेश के हाथ भी मुलायम ने बांध रखे हैं। पंचम तल पर सीएम की नहीं, मुलायम की चहेती एक महिला अधिकारी की ही चलती है। ट्रांसफर पोस्टिंग पश्चिम में रामू चाचा और आजम चच्चा तो पूरब में शिवपाल की इच्छा के खिलाफ हो ही नहीं सकती। इसी वजह से मुख्य सचिव दीपक सिंघल बन गये जबकि अखिलेश उनको नहीं पसंद करते हैं।

रामू चाचा, शिवपाल पहलवान और आजम चच्चा
इन तीनों के बयानों व गतिविधियों से तो यही लगता है कि ये शायद अखिलेश को दोबारा सीएम नहीं देखना चाहते। बुलंदशहर कांड पर रामू चाचा और आजम चच्चा का बयान देखिये। २०१२ में अखिलेश ने आजम से दो-दो हाथ किये थे तो शिवपाल को भी सलीके से समझाया। इसका अच्छा मेसेज गया था और अखिलेश से लोगों की उम्मीदें बंध गईं जो चुनाव में बढ़े हुए वोट प्रतिशत में तब्दील हुईं। लेकिन अभी तो यही लग रहा है कि अखिलेश की साइकिल की छूंछी खोलने की जुगत में लगे हैं ये तीनों।

और अमर सिंह सतर्क हैं
इन तीनों से कोई मोर्चा लेने की कूवत रखता है तो अमर सिंह। कहा जाता है कि दूध का जला मट्ठा भी फूंक-फूंक कर पीता है। अमर सिंह इसी कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। इस तिकड़ी के चलते वे पिछली बार बाहर हो गये थे और नेताजी चाहकर भी उनको मना नहीं पाये थे। अमर सिंह को लग रहा था कि दूसरी पार्टियां उनको हाथों-हाथ लेंगी। लेकिन वैसा हुआ नहीं। उन्हें यह भी गुमान था कि क्षत्रिय उनके पीछे गोलबंद हो जाएंगे लेकिन यहां भी वे फुस्स हो गये।किसी तरह सपा में इंट्री मिली तो वह अब कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। वैसे भी अमर सिंह जानते हैं कि यह उनके राजनीतिक कैरियर का अवसान ही है। अवसान सम्मानप्रद रहे, उनकी कोशिश बस यही है।

अखिलेश हवा टाइट कर दें तो…
यदि अखिलेश रामू चाचा और आजम चच्चा की हवा टाइट कर दें तो तस्वीर बदल सकती है। यदि वह ऐसा कर पाएं तो पंचम तल भी उनकी पकड़ में आ जाएगा। इसका संदेश पूरे प्रदेश में अखिलेश की साइकिल को रफ्तार पकड़वा सकता है और पंचकोणीय चुनाव में वह कड़ी टक्कर की स्थिति में आ सकते हैं। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या अखिलेश ऐसा कर पाएंगे?

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